Pateti festival , पर्सियों का नववर्ष (पतेति पर्व) 600 words

Published by Ravi Raushan on

Pateti festival , पर्सियों का नववर्ष (पतेति पर्व) 600 words

यूं तो समस्त जगत में अनेक धर्मावलंबी रहते हैं । अनेक धर्मावलंबियों के फेहरिस्त में एक धर्म होता है पारसी धर्म । अनेक धर्मों की तरह पारसी  धर्म के अनुयायियों की अपनी रीति रिवाज ,संस्कृति,पूजा अनुष्ठान, त्योहार एवं परंपराएं होती हैं । उत्सव धर्मिता पर्सियों के जीवन में भी विविध रंगों में फैला हुआ है।उनमें से एक है नववर्ष जिसे हम पतेति पर्व (Pateti festival)भी कहा जाता है ।हर वर्ष 19 अगस्त को मनाया जाता है। पारसी समुदाय के लिए नवरोज आस्था और उल्लास का संगम है।नववर्ष आशा उत्साह विकास और समृद्धि का प्रतीक होता है। पारसी धर्म के संस्थापक का नाम जरस्तु है क्योंकि भगवान  जरस्तु का जन्म अगस्त माह में हुआ था इसलिए पारसी के जीवन में अगस्त माह का विशेष महत्व है।

 

भगवान जरस्तु का जन्म दिवस 24 अगस्त को मनाया जाता है।पर्सियों को जरस्थूटी भी कहा जाता है। नव वर्ष पारसी समुदाय में बड़े धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। पारसी धर्म में इसे खौरदाद साल के नाम से भी जाना जाता है।पर्सियों में 1 साल 360 दिनों का होता है और शेष 5 दिन गाथा के लिए होता है। गाथा मतलब अपने पूर्वजों को स्मरण करने का दिन।गाथा काल में पारसी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा अनुष्ठान करते हैं।इस दिन परिवार के लिए स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखने की प्रार्थना भी करते हैं।पूजा अर्चना का और भी खास तरीका होता है, रात्रि के 3:30 बजे से खास पूजा-अर्चना होती है। पारसी धर्म के लोग चांदी या स्टील पात्र में फूल रखकर अपने पूर्वज को याद करते हैं।

 

जब देश दुनिया में परिवर्तन की हवा चली तो यह लोग रोजगार, व्यापार हेतु विभिन्न देशों में चले गए किंतु अपने धर्म, संस्कृति, साहित्य, रीति रिवाज आदि का  परीत्याग नहीं किया। वहां भी लोग अपने रीति रिवाज एवं परंपरा के अनुसार नव वर्ष बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं।पारसी धर्म के लोग इस त्योहार को पारसी पंचांग के पहले महीने की प्रथम दिवस विशेष धूमधाम और ऊर्जा एवं उत्साह से मनाते हैं। भारत में पारसी धर्म के अनुयाई पूजा पाठ शहशाही पंचांग के अनुसार मनाते हैं। जिसका अर्थ यह होता है कि नव वर्ष का त्यौहार वर्ष के आगे के महीने में आता है।

 

यह उत्सव ब्रह्मांड के सभी चीजों के वार्षिक नवीकरण को दर्शाता है। लोक कथाओं  के अनुसार नवी जरस्तु ने यह पर्व मनाया था और यह त्योहार आज भी महाराष्ट्र के अधिकतर हिस्सों में एक महत्वपूर्ण त्योहार के रूप में मनाए जाते हैं। पारसी धर्म के  अनुयायियों को इस व्यवहार का पहले से ही इंतजार रहता है इसलिए समय पूर्व ही यह लोग इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। सभी धर्मावलंबी इस अवसर पर अपने घरों दुकानों एवं रास्तों के विशेष सफाई करते हैं।इस अवसर पर स्वच्छता एवं पवित्रता की खास ध्यान रखते हैं। यह पर्व स्वच्छता का भी संदेश देता है घर के बाहर भीतर सजावट करते हैं ,गांव नगर दुल्हन की तरह सज-धज कर तैयार हो जाता है विशेष रूप से घर के मुख्य दरवाजे को आने वाले अतिथियों के स्वागत के लिए फूलों की माला और चौक पाउडर से आकर्षक तरीके से सजाते हैं।सजावट में प्राकृतिक दृश्य को विशेष तवज्जो देते हैं और आकर्षक तरीके से सजावट की जाती है। विविध प्रकार की सजावट एक अलग ही छटा बिखेरती है।

 

मेहमानों के स्वागत करने के लिए उन पर गुलाब जल का छिड़काव किया जाता है। इस पवित्र अवसर (Pateti festival) पर दीन-दुखियों और जरूरतमंद लोगों की सहायता भी करते हैं। इससे समाज में समानता एवं सौहार्द भी उत्पन्न होता है।सुबह के नाश्ते के बाद वे लोग अग्नि  मंदिर जाते हैं  क्योंकि यह पूरे वर्ष को एक साथ जोड़ती है।  नाश्ता के  बाद परिवार और समाज में समृद्धि लाने हेतु प्रार्थना करते हैं, और एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं। यह नववर्ष वैश्विक परिवर्तन के बाद भी अपना कमनियता, रमणीयता एवं मौलिक सौंदर्य को बनाए हुए हैं।

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